ईश्वर ने जब धरती पर मनुष्यता का निर्माण किया
उसे निभाने का दायित्व एक पिता को दिया
जब इस पावन भूमि को त्याग और समर्पण की आवश्यकता महसूस हुई
अवतरित हुए पिता यहाँ, उनकी परछाई सभीके हृदय को जा छुई
माँ की ममता तो सभीने देखी और महसूस की है
परन्तु परदे के पीछे रहकर हमें आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी एक पिता ने ली है
हमें हमेशा खुश रखने के लिए, वे स्वयं को न्यौछावर कर देते हैं
सारी खुशियां हमें देकर, खुद में दुःख की पोटली समेट लेते हैं
न जन्मा है, ना जन्मेगा, पिता समान कोई इस धरती पर कभी
उनके बिना इस जहाँ में, अस्तित्वविहीन हैं सभी
चाहे कितने भी बड़े हो जाओ तुम, पिता का कभी न करना अपमान
तुम्हारे सात जन्मों के संस्कार भी कम पड़ जायेंगे, देने को इन्हे सम्मान
आँखों में कभी आंसू तो देखे नहीं, परन्तु इनके हृदय को रोते देखा है
ग्रन्थ लिखोगे तो भी पड़ जायेंगे कम, इतना तो इनके त्याग समर्पण का लेखा है
वृद्धाश्रम सभी बंद हो जाएँ, यदि इस बात का संकल्प लेकर चलोगे
महक उठेगी ये पवन धरती , स्वयं तुम भी फलोगे फुलोगे
माँ की कोमल ममता के साथ पिता के कठोर हृदय को भी करो स्वीकार
धन्य हो जायेगा जीवन तुम्हारा, जिंदगी में कभी नहीं मिलेगी हार.
Bahut ache bhanu sir.... Kam shabdo k bht badi kahne ka ye prayas kabil-e-tareef hai...
ReplyDeleteWell done...
Touching lines
Bhut bhut dhanyawaad
DeleteSupreme sacrifice........
ReplyDeleteAbsolutely sir
DeletePoem truly reflects that it has been written from the core if heart.Really, Papa is there or not but his immortal aura always keep us blessed.
ReplyDeleteYeah mam
DeleteThank you
Bhut khoob sir
ReplyDeleteDhnyawaad
DeleteKya baat Kya baat❤😘😘
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