Wednesday, 13 February 2019

स्वच्छ भारत

जब होते देखता हूँ हर छण एक नया तमाशा
प्रश्न से गूँज उठता है मन,आखिर क्या है यह स्वच्छ भारत की परिभाषा
क्या सिर्फ कूड़े को साफ़ कर देना ही इसका उद्देश्य एकमात्र है,
और सफाईकर्मी ही इसे अंजाम तक पहुचाने वाला असली पात्र है
यह स्वच्छता क्या सिर्फ बाहरी रख रखाव तक सीमित है
दुसरे की परवाह किये बिना स्वयं साफ़ रहें,क्या इससे होता देश का हित है
यह स्वच्छता पहले स्वयं के अंतःकरण में लानी है
और यदि आये देश के काम ,तो सार्थक ये जवानी है
जिस दिन लड़कों के मन में लड़कियों को देखकर गंदगी नहीं रहेगी
मेरा भारत स्वच्छ है,यह हर घर की माँ बहन कहेगी
जब जात पात का पिटारा हमसे कोसों दूर हो जाएगा
तो यह हिंदुस्तान,स्वयं को विश्व में सबसे स्वच्छ पायेगा
हिन्दु की मदद को जब मुसलमान अपना हाथ आगे बढ़ाएगा
और गुरूद्वारे का लंगर हिन्दू ईसाई साथ में खाएगा
तो यह भारत माता का मस्तक गर्व से ऊँचा हो जायेगा
और मेरा महान भारत फिर से विश्वगुरु कहलायेगा
तो शुरू कर दीजिये सफाई और आगे बढाइये इस अभियान को
तुम हो इस देश के युवा,गिरने न देना देश के सम्मान को
फिर शायद असल मायनों में,यह देश स्वच्छ हो जायेगा
और इसके कर्णधारों में,आपका नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में आएगा
जय हिन्द जय भारत।        

Saturday, 29 December 2018

सही और गलत

अचानक से राह में मिले दो राही, नाम था गलत और सही
दोनों ने स्वयं को दुसरे से बड़ा दिखाने को अपनी अपनी कहानी कही 
 सही ने सत्य पर चलने वालों के उदाहरणों की लगा दी बौछार 
परन्तु इन तीखे व्यंगों से भी नहीं मानी गलत ने अपनी हार 
जब बताना शुरु किया की किस तरह लोग गलत करते हुए इतना आगे बढ़ गए हैं 
और न जाने कितने उसे गलत साबित करते करते ही मिटटी के अंदर गढ़ गए हैं 
दोनों के बीच वाद विवाद जब पहुंचा चरम सीमा से आगे
तो उसे सुलझाने को वे दोनों सीधा मनुष्य के पास भागे
उन्हें तो भनक भी न थी मनुष्य स्वयं में इतना मक्कार है
परिस्तिथि चाहे कुछ भी हो जाये मानता न अपनी हार है
मनुष्य ने दोनों को अपनी बात रखने का मौका दिया भरपूर
परन्तु इतने में भी दोनों की मुश्किल न होती दिखी दूर
स्वार्थी मनुष्य ने आखिर चालाकी से बीच का एक रास्ता निकला
गलत कारनामों को सफ़ेद चादर ओढ़ाकर सही के मुँह में जड़ दिया ताला
परन्तु वह भी कब तक सच्चाई से मुँह मोड़े रहता
कब तक सही गलत द्वारा किये अत्याचारों को सहता
फिर जब मनुष्य का स्वयं का अस्तित्व ही खतरे में आया
बुद्धि विवेक जगा तो उसने सही को उसके असल रूप में अपनाया
परन्तु अभी भी सही गलत मे खुद को सर्वश्रेष्ठ कहलाने की जंग जारी है
कभी सही तो कभी गलत का पलड़ा भारी है।

Saturday, 5 May 2018

बचपन:एक मीठी याद

लगता है मुझे अब वह बचपन कहीं खो गया है
इस असीम प्रकृति के आँचल में,मुँह ढककर सो गया है
अब नहीं चेहरों में वह खिलखिलाती हंसी का भाव दिखता है
कल का यह नादान बचपन, अब दुनियादारी सीखता है
पहले सिक्कों की खनक में भी जो ख़ुशी मिलती थी
आज हज़ार के नोटों के बण्डल में भी दिखती नहीं
अब रातें चंदा मामा और तारों के बीच गुजारी नहीं जाती
वो नानी की परियों और राजाओं की कहानी,अब मुझे है बहुत सताती
दादी नानी की कहानियां , जिसमे हम खो जाया करते थे
वो स्कूल की मस्ती भरी बातें, जिसे हम अपने दिलों में भरते थे
वो माँ के हाथ का स्वादिष्ट खाना, जिसका स्वाद ५ स्टार होटल में भी नहीं मिलता
क्यों बचपन का मुरझा सा गया फूल, अब हमारे दिलों मे नहीं है खिलता
वह कभी न रुकने और कभी न थकने वाली बचपन की बात
कितना हसीन होता था,वह हंसी ठिठोली और एक दूसरे का साथ
स्कूल के टिफिन में न जाने कितनी खुशियां ले जाते थे
और उन खुशियों के खजाने को, मिल बांटकर खाते थे
मन करता है की काश, फिर से मुझे वह बचपन मिल जाए
बीत जाये ये जिंदगी, जीते हुए वह सारी खुशियों के साये

Tuesday, 24 April 2018

पिता: एक समर्पण

ईश्वर ने जब धरती पर मनुष्यता का निर्माण किया 
उसे निभाने का दायित्व एक पिता को दिया 
जब इस पावन भूमि को त्याग और समर्पण की आवश्यकता महसूस हुई 
अवतरित हुए पिता यहाँ, उनकी परछाई सभीके हृदय को जा छुई 
माँ की ममता तो सभीने देखी और महसूस की है 
परन्तु परदे के पीछे रहकर हमें आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी एक पिता ने ली है 
हमें हमेशा खुश रखने के लिए, वे स्वयं को न्यौछावर कर देते हैं 
सारी खुशियां हमें देकर, खुद में दुःख की पोटली समेट लेते हैं 
न जन्मा है, ना जन्मेगा, पिता समान कोई इस धरती पर कभी 
उनके बिना इस जहाँ में, अस्तित्वविहीन हैं सभी 
चाहे कितने भी बड़े हो जाओ तुम, पिता का कभी न करना अपमान 
तुम्हारे सात जन्मों के संस्कार भी कम पड़ जायेंगे, देने को इन्हे सम्मान 
आँखों में कभी आंसू तो देखे नहीं, परन्तु इनके हृदय को रोते देखा है 
ग्रन्थ लिखोगे तो भी पड़ जायेंगे कम, इतना तो इनके त्याग समर्पण का लेखा है 
वृद्धाश्रम सभी बंद हो जाएँ, यदि इस बात का संकल्प लेकर चलोगे 
महक उठेगी ये पवन धरती , स्वयं तुम भी फलोगे फुलोगे 
माँ की कोमल ममता के साथ पिता के कठोर हृदय को भी करो स्वीकार 
धन्य हो जायेगा जीवन तुम्हारा, जिंदगी में कभी नहीं मिलेगी हार.


Monday, 2 April 2018

विवेकानंद की तलाश

इस बदलते भारतवर्ष से, अभी भी मुझे आस है
करोड़ों युवाओं के बीच, एक अदद विवेकानंद की तलाश है
जब यह युवा सामने अत्याचार होते देख भी खामोश रहता है
न आगे जाकर अपना हक़ मांगता है, न कुछ कहता है
जब रात को लड़की का घर से बाहर निकलना दूभर हो जाता है
और पेट की प्यास बुझाने को, कोई दूसरों का बचा खाता है
तब मेरे मन में विचार आता है, क्या यही हमारे देश का विकास है
करोड़ों युवाओं के बीच, एक अदद विवेकानंद की तलाश है
आज जब सरकारी दफ्तरों में, शहीद का बूढ़ा बाप ठोकरें खाता है
और कोई चुनाव में खुद की जीत को, करोड़ों यूं ही बहाता है
जब कोई धर्म के नाम पर, दूसरों के घर जलाता है
जात -पात के नाम पर, न जाने कितनों की बलि चढ़ाता है
तब मेरे मन में विचार आता है, क्या अभी भी मानवता मानव के पास है
करोड़ों युवाओं के बीच, एक अदद विवेकानंद की तलाश है
आज क्यों घरों में, बुजुर्गों का स्थान नहीं रहता
गलत करने वालों को न कोई रोकता न उसके खिलाफ कुछ कहता
क्यों पग पग भूमि के लिए, भाई भाई का दुश्मन बन जाता है
क्यों आज कश्मीर पूरी तरह, हिंदुस्तान नहीं  कहलाता है
फिर भी मुझे अपनी संस्कृति पर पूरा विश्वास है
करोड़ों युवाओं के बीच, एक अदद विवेकानंद की तलाश है

Wednesday, 14 February 2018

जाग रे नारी, स्वयं को पहचान


जाग रे नारी, स्वयं को पहचान
तू ही है इस जग की जननी, तुझसे ही है इसकी शान
इस कलियुग में शायद तू अपना अस्तित्व भूल रही है
अपनी जिम्मेदारियों और दुनिया के अत्याचारों के बीच झूल रही है   
कोई तेरा फायदा उठाये, मत समझ तू खुद को इतना कमजोर
तेरी ऑंखें खुले बिना, नहीं हो पायेगी इस जग में नयी भोर
तेरी ममता के आंचल में, यह मानव जीवन सुरक्षित रहता है
तू ही प्राण वायु बनकर, हमारी रगों में बहता है
यदि कोई विपत्ति आये, तो मत भूलना नारी
धारण  किये माँ दुर्गा का स्वरुप, करना शेर की सवारी
अत्याचारी का ही नहीं, वरन अत्याचार का ही अस्तित्व मिटा देना
सबक सीखकर उसे, अपने चरणों की धूल में लिटा देना
आज ऐसा कोई स्थान नहीं, जहां तेरी काया हो
कभी जगमगाया नहीं वो दीप, जिसमे तेरा साया हो
तू ही गर्मियों की बारिश, तू ही सर्दियों की धूप है
तू ही माँ जगतजननी, तू ही काली का स्वरुप है
आज के इस भूले-भटके जनमानस को सही मार्ग दिखा
सांसारिक आकर्षण में बंधे इस मानव जीवन को मानवता का पाठ सीखा
जाग रे नारी , स्वयं को पहचान
तू ही है इस जग की जननी, तुझसे ही है इस जग की शान

Friday, 26 January 2018

26 Januray, The Reality

                                       गणतंत्र दिवस 


आज भारत माता की जय कहती हुए निकली एक टोली
सभी समूह में चल रहे थे लेकर सूरत भोली
आवाज में उमंग थी चेहरों में थी मुस्कान
सामने लहरा रही थी हमारे तिरंगे की शान .
लग गया जमघट, भारत माँ की जय जयकार हुई
युवाओं के हौसलों के आगे, ठण्ड और कोहरे की हार हुई
सभा हुई ख़त्म, सभी लोग वापस लौट के चले आये
पीछे उनको पुकारते रह गए , उनके देशभक्ति के साये
पास में ही ठिठुरता हुआ एक जानवर पर किसी का न गया ध्यान
ऊपर तिरंगा देख रहा था, गिरते हुए अपनी शान
अचानक से कहीं से १० साल का एक बच्चा आया
उसे ठिठुरते हुए देख, वह खुद को रोक न पाया
हाथों में रखा तिरंगा उसने उस जानवर को ओढ़ाया
अपनी सच्चे भारत को देखकर, ऊपर से तिरंगा भी मुस्कुराया
अरे देश के युवा, अपने इस मुँह से भारत माता की जय मत बोल
हमेशा जेबों को देखता है, आज अपनी आत्मा को भी टटोल
अपने शहीदों के आदर्शों को जीवन में शिरोधार्य कर
ये भारत माँ तुझ पर अपना सपूत होने का गर्व करे,
कुछ तो ऐसा कार्य कर, कुछ तो ऐसा कार्य कर


                                                        जय हिन्द जय भारत