लगता है मुझे अब वह बचपन कहीं खो गया हैइस असीम प्रकृति के आँचल में,मुँह ढककर सो गया है
अब नहीं चेहरों में वह खिलखिलाती हंसी का भाव दिखता है
कल का यह नादान बचपन, अब दुनियादारी सीखता है
पहले सिक्कों की खनक में भी जो ख़ुशी मिलती थी
आज हज़ार के नोटों के बण्डल में भी दिखती नहीं
अब रातें चंदा मामा और तारों के बीच गुजारी नहीं जाती
वो नानी की परियों और राजाओं की कहानी,अब मुझे है बहुत सताती
दादी नानी की कहानियां , जिसमे हम खो जाया करते थे
वो स्कूल की मस्ती भरी बातें, जिसे हम अपने दिलों में भरते थे
वो माँ के हाथ का स्वादिष्ट खाना, जिसका स्वाद ५ स्टार होटल में भी नहीं मिलता
क्यों बचपन का मुरझा सा गया फूल, अब हमारे दिलों मे नहीं है खिलता
वह कभी न रुकने और कभी न थकने वाली बचपन की बात
कितना हसीन होता था,वह हंसी ठिठोली और एक दूसरे का साथ
स्कूल के टिफिन में न जाने कितनी खुशियां ले जाते थे
और उन खुशियों के खजाने को, मिल बांटकर खाते थे
मन करता है की काश, फिर से मुझे वह बचपन मिल जाए
बीत जाये ये जिंदगी, जीते हुए वह सारी खुशियों के साये