Monday, 2 April 2018

विवेकानंद की तलाश

इस बदलते भारतवर्ष से, अभी भी मुझे आस है
करोड़ों युवाओं के बीच, एक अदद विवेकानंद की तलाश है
जब यह युवा सामने अत्याचार होते देख भी खामोश रहता है
न आगे जाकर अपना हक़ मांगता है, न कुछ कहता है
जब रात को लड़की का घर से बाहर निकलना दूभर हो जाता है
और पेट की प्यास बुझाने को, कोई दूसरों का बचा खाता है
तब मेरे मन में विचार आता है, क्या यही हमारे देश का विकास है
करोड़ों युवाओं के बीच, एक अदद विवेकानंद की तलाश है
आज जब सरकारी दफ्तरों में, शहीद का बूढ़ा बाप ठोकरें खाता है
और कोई चुनाव में खुद की जीत को, करोड़ों यूं ही बहाता है
जब कोई धर्म के नाम पर, दूसरों के घर जलाता है
जात -पात के नाम पर, न जाने कितनों की बलि चढ़ाता है
तब मेरे मन में विचार आता है, क्या अभी भी मानवता मानव के पास है
करोड़ों युवाओं के बीच, एक अदद विवेकानंद की तलाश है
आज क्यों घरों में, बुजुर्गों का स्थान नहीं रहता
गलत करने वालों को न कोई रोकता न उसके खिलाफ कुछ कहता
क्यों पग पग भूमि के लिए, भाई भाई का दुश्मन बन जाता है
क्यों आज कश्मीर पूरी तरह, हिंदुस्तान नहीं  कहलाता है
फिर भी मुझे अपनी संस्कृति पर पूरा विश्वास है
करोड़ों युवाओं के बीच, एक अदद विवेकानंद की तलाश है

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