जाग रे नारी, स्वयं को पहचान
तू ही है
इस जग की
जननी, तुझसे ही
है इसकी शान
इस कलियुग में शायद
तू अपना अस्तित्व
भूल रही है
अपनी जिम्मेदारियों और दुनिया
के अत्याचारों के
बीच झूल रही
है
कोई तेरा फायदा
उठाये, मत समझ
तू खुद को
इतना कमजोर
तेरी ऑंखें खुले बिना,
नहीं हो पायेगी
इस जग में
नयी भोर
तेरी ममता के
आंचल में, यह
मानव जीवन सुरक्षित
रहता है
तू ही प्राण
वायु बनकर, हमारी
रगों में बहता
है
यदि कोई विपत्ति
आये, तो मत
भूलना ऐ नारी
धारण किये
माँ दुर्गा का
स्वरुप, करना शेर
की सवारी
अत्याचारी का ही
नहीं, वरन अत्याचार
का ही अस्तित्व
मिटा देना
सबक सीखकर उसे, अपने
चरणों की धूल
में लिटा देना
आज ऐसा कोई
स्थान नहीं, जहां
तेरी काया न
हो
कभी जगमगाया नहीं वो
दीप, जिसमे तेरा
साया न हो
तू ही गर्मियों
की बारिश, तू
ही सर्दियों की
धूप है
तू ही माँ
जगतजननी, तू ही
काली का स्वरुप
है
आज के इस
भूले-भटके जनमानस
को सही मार्ग
दिखा
सांसारिक आकर्षण में बंधे
इस मानव जीवन
को मानवता का
पाठ सीखा
जाग रे नारी
, स्वयं को पहचान
तू ही है
इस जग की
जननी, तुझसे ही
है इस जग
की शान
Good going bhanu
ReplyDeleteThanks bro
DeleteBadia
ReplyDeleteTysm mam
DeleteBadia
ReplyDeleteBahut umda....Bhanu..loved it
ReplyDeleteThanks whosoever it is
DeleteBhanu keep it up .. ashirwad sath h 😉
ReplyDeleteDhnyawad sir ji
DeleteBs ab r aage badenge
Thumbs up..👍
ReplyDeleteDhnyawad mam ji
DeleteBadiya bandhu....Achha likha h...
ReplyDeleteDhnyawad sir ji
DeleteRhyme add a rhythem to poetry...so well done ..keep writting
ReplyDeleteThank you so much mam
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